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Hindi poet and translator based in Bangalore, India.
Category: हिंदी
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वे कह सकते हैं कि भाषा की ज़रुरत नहीं होती साहस की होती है फिर भी बिना बतलाये कि एक मामूली व्यक्ति एकाएक कितना विशाल हो जाता है कि बड़े-बड़े लोग उसे मारने पर तुल जायें रहा नहीं जा सकता – रघुवीर सहाय, दो अर्थों का भय’ कविता से जर्मन दार्शनिक लुडविग विट्गेंस्टाइन के मुताबिक…
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कुछ दिन पहले मथुरा में स्वामी बालेन्दु द्वारा आयोजित नास्तिकों के एक सम्मेलन के निरस्त कर दिए जाने की ख़बर सामने आई। सम्मलेन के विरोध में संत, महंत, और इमाम एकजुट होकर खड़े हो गए। मथुरा में धार्मिक गुटों का उन्माद और आक्रोश देखकर जनपद में धारा 144 लगाने का निर्देश पारित किया गया। विवाद…
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साहित्य और लेखन पर कुछ विचार.
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हिंदी में एक कहावत है – “कोस कोस पर पानी बदले, चार कोस पर बानी।” हम इस बात को अक्सर बड़े गर्व से कहते हैं, मगर क्या हर चार कोस में भाषा का बदलना हमारे पिछड़ेपन का प्रतीक नहीं? क्या यह नहीं दर्शाता कि भारत की एक बहुत बड़ी जनसँख्या अपने चार कोस की सीमा…
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1967 में मार्टिन लुथर किंग जूनियर ने वियतनाम के कवि और बौद्ध भिक्षु थिक नात हान को नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित करते हुए कहा था – “मैं किसी दूसरे ऐसे व्यक्ति को नहीं जानता जो इस पुरस्कार के इतना योग्य है। वियतनाम के इस शान्तिदूत की बातों पर अगर ग़ौर किया गया तो विश्व…