डुबुक!

जापान के प्रसिद्द कवि मात्सुओ बाशो (1644-1694) ने साल 1686 में अपनी सबसे प्रसिद्द कविता ‘पुराना तालाब’ की रचना की थी। कविता की रचना-प्रक्रिया को याद करते हुए इनके शिष्य शिको ने लिखा है, “यह कविता वसंतकाल में लिखी गई थी। हमारे गुरु आँगन में बैठकर हलकी बारिश के बीच कबूतरों की आवाजें सुन रहे थे। हवा थोड़ी तेज़ थी, और चेरी की पंखुडियां रह-रहकर ज़मीन पर आ गिरतीं। वसंत के आखिरी दिनों का ख़ूबसूरत मौसम, जब आप चाहते हैं कि वक़्त ठहर जाए और दिन कभी ख़त्म न हो।”

आगे लिखते हैं, “थोड़े-थोड़े समय पर बगीचे में मेंढकों के पानी में छलांग लगाने की आवाज़ सुनाई पड़ती।

हमारे गुरु लम्बे समय तक ध्यानमग्न रहे। फिर उन्होंने कविता की आखरी दो पंक्तियाँ लिखीं –

कूदा मेंढक –
डुबुक !

इनके एक शिष्य किकाकु (1661-1707) ने पहली पंक्ति सुझाई –

पीले गुलाबों के बीच से

बाशो थोड़ी देर तक सोचते रहे और कविता पूरी की –

पुराना तालाब
मेंढक कूदा –
डुबुक !”

कविता में तीन पंक्तियाँ हैं। पहली पंक्ति में एक पुराना तालाब है जो शांत पड़ा है। यह तालाब चिरंतन है, शाश्वत है। आदमी से बहुत पहले, पृथ्वी में जीवन से पहले पानी था। कविता की आखरी पंक्ति पानी की केवल एक अभिव्यक्ति – आवाज़ – बची रह जाती है। बीच की पंक्ति दिलचस्प है। कविता का कर्ता और कर्म यही दो शब्द हैं। एक मेंढ़क है, बाशो की कविताओं के कई नायकों की तरह अकेला सा, जो पानी में कूदता है। पंक्ति लगभग हास्यास्पद है, लेकिन आगे और पीछे की पंक्ति में विस्तृत पानी उसके कूदने की क्रिया की निरर्थकता को दर्शाकर हमें हंसने से रोक लेता है। तीसरी पंक्ति के शुरू होने तक मेंढ़क अपनी प्रतिछाया में डूबकर अदृश्य हो चुका है, और हम केवल पानी की आवाज़ सुनते हैं।

वहीं दूसरी तरफ एक मेंढ़क को इतने पास से देखना एक विलक्षण अस्तित्ववादी रूपक गढ़ देता है। यहाँ मेंढ़क का कूदना भी एक बड़ी क्रिया है। बाशो इसे लगभग एक उत्सव की तरह देखते हैं। इसी गहरी जीवन दृष्टि से प्रकृति में झांकते हुए बाशो कभी घास की नोक पर एक पतंगे को उतरते-फिसलते हुए देखते हैं तो कभी फूल से एक भौंरे को डगमगाकर निकलते हुए। बाशो जैसे एक मैग्नीफाइंग ग्लास लेकर साधारण सी घटनाओं में अर्थपूर्ण सम्बन्ध तलाशते फिरते हैं।

इस तलाश की कुछ बुनियादें भी हैं। बाशो मानते थे कि कविता में एक स्थाई, अविकारी तत्व होता है, जिसे ‘फुएकी’ कहते हैं। ‘पुराना तालाब’ कविता में पानी वह अविकारी तत्व है, जिसकी अभिव्यक्तियाँ पुराना तालाब और पानी की आवाज़ हैं। पिछले कवियों में मेंढ़क के साथ उसके टर्राने की आवाज़ को जोड़ने की परंपरा चलती आई थी। बाशो इस परंपरा से कटकर कविता में पानी की आवाज़ भर देते हैं। ज़ेन दर्शन में भी पानी का विशेष महत्व रहा है। पानी चिरंतन और शाश्वत है। ज़ेन भिक्खु शताब्दियों से पानी की अलग-अलग आवाजों को सुनने का अभ्यास करते आए हैं। पानी की ध्वनि प्राचीन है और कई रूपों में हमारे बीच व्याप्त है। समूचा जीवन पानी से ही निकला है।

अज्ञेय ने अपने निबंध ‘पानी का स्वर’ में न केवल बाशो की कविता का अपना अनुवाद प्रस्तुत किया है बल्कि कविता की विलक्षण व्याख्या की है। वे लिखते हैं, “कवि जो काव्यं करता है वह न – कुछ में से कुछ पैदा कर देने का जादू नहीं होता है, वह अव्यक्त में से व्यक्त को रूपायित करने का जादू होता है। अव्यक्त में से व्यक्त का आविष्कार, उद्धार, रूपायन –  जहाँ तक कवि का सवाल है सृष्टि यही है।” आगे लिखते हैं, “जल परम्परा से अव्यक्त का प्रतीक है। […] उसमें मेंढक छलाँग लगाता है और अव्यक्त का सन्नाटा बज उठता है।” इस विलक्षण निबंध में अज्ञेय पानी की ऐसी कई चिरपरिचित आवाजों का उल्लेख करते हैं जो किसी कविता से कम नहीं –

“मैंने पतली ग्रीवा वाली सराही के लुढ़क जाने से बहते पानी का स्वर भी सुना है और अपने ही बनाए छोटे से ताल में गिरते हुए पहाड़ी झरने का स्वर भी; पर्वती प्रदेश में छतों पे जमी हुई बर्फ़ के पिघल कर बूँद- बूँद रिसने का स्वर भी और किनारे लगी नाव पर नदी की लहरों की थपक भी। मैंने कुएँ के जल में डूबती गागर के पानी से भरने का स्वर भी सुना है, तूफ़ानी बादलों के फट पड़ने से सागर पर पड़ती हुई पानी की मार भी। और ये केवल दो चार उदाहरण हैं: पानी के स्वर की बात सोचने लगता हूँ तो मानो पानी के बाँध टूट जाते हैं – कोई सीमा नहीं रहती। ओस की अथवा आँसू की ढरकन का स्वर भी तो पानी का ही स्वर है और नदी के बाँध टूटने का स्वर भी तो पानी का स्वर है। निलकंठ छोटी मछली को पकड़ने के लिए धन-खेत में फैले पानी पर गिरता है और उड़ जाता है, वहाँ भी पानी का एक स्वर है। और पहाड़ी घराट के नीचे मानो मुहँ से झाग छोड़ते हुए क्रुद्ध पानी का स्वर भी पानी का ही स्वर है… और कभी कभी सन्नाटे में अपने ही रगों में दौड़ते हुए लहू की जो सनसनाहट कानों में सुनाई दे जाती ही वह भी क्या पानी का ही स्वर नहीं है?”

बाशो की कुछ और कविताओं में पानी के स्वर सुनें –

गुलाब की पीली पंखुड़ियाँ
गर्जना –
एक झरना ।

रात को उठा –
बर्तन में पानी के जमने की
कड़कड़ाती आवाज सुन ।

साधुओं के पदचाप
गाढ़े बर्फ से निचोड़ती
मीठा पानी ।

मात्सुओ बाशो की कविताएँ –

गरीब लड़का –
पीसता चावल
चाँद देखते हुए ।

सुन्दर कटोरा –
चावल नहीं तो
आओ भरें फूल ।

गहरे पतझड़ में
इल्ली करती
तितली होने के इन्तेजार ।

बाँस के जंगल पर
चाँद की टेढ़ी रौशनी;
कोयल की कूक ।

भंवरा
डगमगाकर निकलता
लाल फूल से ।

पतंगा –
घास की नोक पर
उतरता, फिसलता ।

गर्मियों की घास
योद्धाओं के सपनों के
अवशेष ।

थके टांगों पर
बैठा कौवा
पतझड़ की रात ।

तरबूज
सुबह की ओंस में
कीचड़ सना ।

मछली पकड़ता जलकौवा
कितना दारुण
कितना दुखद ।

फटेहाल साधू
वसंत आने पर
मिलते, बतियाते ।

हलकी नींद,
ठंडी दीवार पर
पाँव टिके हुए ।

पहला बर्फ
गिरता
अधबने पुल पर ।

आओ एकांत, देखो
अकेली पत्ती चिपटी हुई
किरी के पेड़ से ।

जागो, तितली
भोर हुई है
दूर जाना है ।

बाँस के जंगल पर
चाँद की टेढ़ी रौशनी;
कोयल की कूक ।

जापानी कविता पर प्रकाश्य किताब का एक अंश. सदानीरा 20 से साभार.

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