प्रेम-कथाओं के खलनायक

प्रेम-कथाओं के खलनायक
विलुप्त हो रहे हैं
हमारी कहानियों को अब
उनकी ज़रुरत नहीं

लड़की का रंगदार भाई
अब नहीं घूमता मोहल्ले में
अपने क्रूर दबंग दोस्तों के साथ
उठा लिया है उसने भारी कर्जा
करनी है उसे शहर जाकर नौकरी

नहीं भागता कोई मनचला
नायक की प्रेमिका के साथ
घर को बाहर से अलग करती लक्ष्मण रेखाएं
अब बदल गई हैं
गहरे खंदकों में

कोई महाज्ञानी विक्षुब्ध बदमाश
अब प्रेमियों के बीच फूट नहीं डालता,
नहीं चुनवाता कोई क्रूर राजा
अनारकली को दीवार में,
कोई खुसरो अपनी शीरीं के लिए
अब पहाड़ काटते फरहाद से धोखा नहीं करता …

ख़त्म हो रहे हैं प्रेम से पहाड़
कि कोई फरहाद अब पहाड़ों की ओर जाने की हिम्मत नहीं करता
कोई मजनू नहीं लिखता
रेगिस्तान की रेत पर प्रेम के गीत !

प्रेम कथाओं के खलनायक
विलुप्त हो रहे हैं
समय से टूटकर अप्रासंगिक हो चुकी है उनकी उत्कंठा,
वासना, विकृतियाँ

वे – जो बचे हैं
अपने-अपने घरों में स्खलित, हताश
एकटक ताकते हैं बंद खिड़कियों पर फैले घुप्प अँधेरे की ओर
और सोचते हैं –
उनके और प्रेमियों की इस पुरानी लड़ाई में
यह तीसरा कौन जीत गया !

– सौरभ राय

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