नोटबुक का खोना

नोटबुक का खोना
एक कठोर कविता है
जिसमें शब्द नहीं हैं

उन दराजों को खोलते हुए
जिन्हें कभी नहीं खोला
मैं तलाशता हूँ
अपनी खोई हुई छाया
जो किसी पेड़ जितनी घनी थी
किस पेड़ जितनी ?
याद नहीं…

तलाशता हूँ
पेड़ से बंधी उस बकरी को
जो पेड़ खा लेने को जुटी रहती थी
शायद रस्सी चबाकर
चली गई

तलाशता हूँ
मीठे उस आम को
जो सीधे हाथ में आ गिरी थी
पत्थर फेंकने से जरा पहले
और फिर चिड़िया बन उड़ गई
हाथ से

नोटबुक का खोना
एक कठोर कविता है
जैसे काट कर ले गया कोई
बरामदे का पेड़ ।

– सौरभ राय