मैं सुनना चाहता हूँ

मैं सुनना चाहता हूँ
एक चलते हुए आदमी के दो पैरों के बीच की बातचीत को

आती हुई साँस और उससे जन्म लेते विचार के बीच के क्षण को
और हर निकलती साँस के साथ भूलते मन के भोलेपन को
महसूस करना चाहता हूँ ।

चाहता हूँ सुनना
एक थकी हुई देह
आधी बिस्तर पर लेटी
और आधी दीवार से टिककर खड़ी
अपने एकांत से
क्या बातें करती है

मैं सुनना चाहता हूँ
स्त्री और पुरुष के बीच की सबसे आत्मीय आवाज़,
किसान की हथेली से गर्माहट चुराकर
धरती से कोंपल के फूटने का स्वर,
सुनना चाहता हूँ
पहली नौकरी मिलने की यादगार शाम
और ट्रैफिक में फंसे घर लौटते आदमी के बीच का
वार्तालाप ।

मैं एकालाप सुनना चाहता हूँ
समुद्री टापू पर खड़े अकेले आदमी का

गिरते हुए परदे
और मंच से अपने जीवन की ओर लौटते नायक के बीच
मैं दबे पाँव प्रवेश करना चाहता हूँ
और सुन लेना चाहता हूँ वह सब
जो कहे जाने की कुलबुलाहट
और एक नितांत सन्नाटे के बीच
खो गई …

और उस रात जब
खिड़की से छिटकी रौशनी अँधेरे के कानों में फुसफुसा रही होगी
मैं सुनना चाहता हूँ मृत्यु की आकस्मिक आहट को

करना चाहता हूँ तहे दिल से स्वागत
कि जब वह मेरे दरवाज़े पर आए
उसे एक पुरानी प्रेमिका की तरह अपने कमरे में बिठाना चाहता हूँ ।
उसकी आँखों की काली पुतलियों में झाँकते हुए
मैं सुन लेना चाहता हूँ
अनकही बातों –
और बीतते समय के बीच जन्म लेते
सुन्दर मौन को ।

– सौरभ राय