कपास

बुआई के मौसम में
इन्हें फुर्सत कहाँ !

नीचे मिट्टी के नाखून इनके पाँव खरोचते हैं
ऊपर आग के बोरे की तरह
लदी रहती है कंधे पर
कड़कड़ाती धूप
कमर से झुककर
कतारबद्ध चलता है परिवार
सौंपते हैं जब ये
धरती को उसकी सबसे आत्मीय चीज

नहीं कोई कमी
इनके जीवन में आशा की
जितनी गहरी साधना
उतनी सुन्दर रचना

पत्नी चाँपाकल से दिन भर खींचती है पानी
बेटी सिर पर मटकियाँ लिए करती है
धरती की परिक्रमा
खेतों पर पानी उड़ेले जाते हैं
किसान कुदाली से करता है तय
नदियों के बहने की दिशा;
रचता है परिवार
सृष्टि की सबसे सुन्दर कविता

एक सुबह निकल आते हैं धरती से
सफ़ेद अनोखे फूल
खड़ी होती है वक्ष उधेड़े धरती
अपने कामुक उन्माद में
बारिश के आलसी दिनों में
किसान को लगने लगती है पत्नी
गदराई और जवान

जीवन के नियमों के विपरीत
सफ़ेद फूल बदलते चले जाते हैं
सुर्ख लाल कलियों में
सिमटते हुए वे एक रात
गायब हो जाते हैं –
सुबह से पत्नी गुनगुनाती है
और बेटी के भोले मन में
जन्म लेती है एक सुन्दर आशंका
कि किसी रात आँगन में चौकस मुर्गी भी न उड़ जाए
अपने अंडे छोड़कर !
अपनी आवारा सहेली को खिलाने लगती है वह
अपने हिस्से का चावल ।

इन बातों से बेखबर
कविता चलती रहती है
अपनी एकाकी राह ;
धरती सेतती है अपने हाथों से
डंठलों पर सजी सुन्दर डोडियों को
निरापद रहते हैं जिनमें
भाषा के सबसे नाजुक बिम्ब

कुछ दिनों के बाद डोडियों से निकल आते हैं
बर्फ के नरम मुलायम गोले
जिन्हें आँचल में भर पत्नी समझाती है बेटी को
कि कैसे हज़ारों वर्षों से लज्जा उगाते हुए
करते आ रहे हैं वे
आदमी को आदमी के रूप में पैदा ।

फिर बदलता है मौसम
और धीरे धीरे कविता में
शब्दों की जगह भरते चले जाते हैं
अर्थहीन काले धब्बे
बदल जाती है आबोहवा –
उड़ते रेशे चुभते हैं
बाज़ार से लौटे किसान की निचाट आँखों में
अँधेरा आँखों की पुतलियों से रिसकर धरती पर फैलने लगता है
एक भरे पूरे कुटुंब के बीच से झाँकने लगते हैं
काले निष्प्राण कीड़े

कम पड़ने लगती है दृश्यों में सफेदी
काली मिट्टी पड़ जाती है
पहले से अधिक काली
सृष्टि का हल्कापन समाप्त हो जाता है
गर्भपात की खबर लटकती रहती है छज्जे से
बदलते मौसम दरवाजा खटखटाकर लौट जाते हैं चुपचाप
नहीं मिलता है कविता को
‘पोएटिक जस्टिस’ का कोई सुख

कटाई के मौसम तक
धरती कुछ अधिक नंगी दिखलाई देती है
कानोंकान खबर नहीं फैलती
की यहाँ भी जीवन बसता था
भाषा खो चुकी होती है वे शब्द
जिनसे लिखी जा सकती थी
किसान के सन्दर्भ में
शोकगीतों से हटकर
कोई कविता ।

– सौरभ राय