काफ्का की कॉपी

आज सुबह मैं उठा तो एक कीड़ा था
मेरी शकल काफ़्का की नक़ल थी
जो मेरे उगाए एक पेड़ पर बैठ
मुझे घूर रही थी

पेड़ एक बन्दर था
बन्दर नकलची था
बन्दर हमारा पूर्वज भी था
पूर्वज नकलची थे
हम एक दूसरे की नक़ल थे

उसकी शकल मुझसे मिलती थी
मैंने उसका मुँह नोचने की पूरी कोशिश की
ह्यूमन राइट का मुक़दमा मेरे पक्ष में था
और कॉपीराइट का हनन हो रहा था

ह्यूमन राइट की तलाश में
मैं चीन की दीवार पर घूमता
एक बेहद जानकार कुत्ता था
चीन की दीवार का स्वाद
नारियल की तरह मीठा था
कुछ मैं खा चुका था
कुछ भविष्य के लिए छोड़ रहा था

दुनिया की हर दीवार पर नारियल
नरमुंडों की तरह सजे थे
दीवारें एक दूसरे से मिलती जुलती थीं
बंद किवाड़ भी इन दिनों
दीवार बन चुके थे
जहाँ बैठा मैं कर रहा था
जिंदगी से लम्बा इंतज़ार

इंतज़ार ख़त्म होने तक
मैं बूढ़ा पुल बन चुका था
जो हलकी सी आहट पर
‘कौन आया’ देखने को
करवट बदल कर गिर रहा था
मेरा गिरना हर उस चीज़ की नक़ल थी
जो गिर सकता था

कुत्ते की तरह
मेरा ‘ट्रायल’ चल रहा था
और दुनिया के हर अपराधी की तरह
ज़ाहिर है
मैं निर्दोष था ।

– सौरभ राय