गंगावली की दोड्डम्मा

उनकी बस्ती आधी ज़मीन
और पूरा समुद्र है –
जहाँ पेड़ की छाया में
रेत पर सुस्ताती हुई वह
खेलती है –
अपने पोते के साथ
‘बाSS बाSS’ कर
समुद्र को
पास बुलाने का स्वरचित खेल

गोद से उतरकर पोता घुटनों के बल भागता है
अपनी झोपड़ी की तरफ
लेकिन बदमाश लहरें
चुपचाप पीछे से आकर
घेर लेती हैं उसे

‘बाSS बाSS’ –
रोते पोते को देख वह हँसती है –
मछुवारे समुद्र से नहीं डरते –
सिखाती है बच्चे को वह
समुद्र को समुद्र बोलना ।

समुद्र भाषा का वह शब्द है जिससे लिखी जा सकती हैं तमाम मानव संवेदनाएं । भोर से ज़रा पहले तारों भरे आकाश का समुद्र पर थिरकता बिम्ब जगा सकती है किसी थके जहाजी के हताश मन में दौड़ कर समुद्र लांघ लेने जैसी प्राचीन कोई इच्छा । जैसे कोई मछली समुद्र की गहराई से आती रोशनी का पीछा करती हो । और शाम ढलते समुद्र से – या कहीं से – किसी पक्षी के न लौटने से आदिम कोई दुख नहीं ।

जिस रात उनके पति-बेटे डूब गए
सुना है –
एक हो गए थे
पहाड़, जंगल, और समुद्र के पक्षी;
आकाश में –
एकसाथ ‘हाय हाय’ चिल्लाते हुए
निकल आया था जुलूस
दूर चमकते बादलों की सत्ता के खिलाफ

अगली सुबह रेत पर बैठ
वह देखती रही
लहरों के टूटने से ज़रा पहले
गाढ़े पानी के खड़े आइनों में
बचे हुए आकाश की छाया

पढ़ती रही
रेत पर फेन और झाग के अक्षरों से लिखी
जीवन के गहरे संदेशों को

एक किताब की तरह समुद्र खुलता रहा
उनकी आँखों के सामने ।

समुद्र से बड़ा दर्शन नहीं है । समुद्र एक बूढ़ा दोस्त है जो आपके मौन को सुनता है – ‘हम्मSS हम्मSS’ – करते हुए ।

अब वह समुद्र बन गई है
बातें उनके मुँह में आकर लौट जाती हैं
नमकीन थूक की तरह
आँखों में दूर दूर तक फैली रहती है
रिक्तता और नमी

सीख ली है उन्होंने
बस्ती के लोगों के पाँव तले की ज़मीन खिसकाकर
उन्हें किनारे पटकने की कला

समुद्र की ओर मुँह कर चिल्लाने से कोई प्रतिध्वनि लौटकर नहीं आती । समुद्र मानव दुख से आदिम दुख है । मानव संवेदना से उदार संवेदना । आदिकवि के नायक का धैर्य टूटा था केवल समुद्र के सामने, और कोई मर्यादा भंग नहीं हुई थी ।

‘बाSS बाSS’ –
पोते को छाती से चिपकाए
वह चलती चली जाती है –
रेत पर पैरों के निशान
आधी नींद में झिलमिलाते हैं
हो रहा है समुद्र के सोने का समय
और लौट रहे होंगे पक्षी
अपने अपने घरों की तरफ ।

– सौरभ राय