फेरीवाले को देखते हुए

सिर पर गठरी बांधे
ऊँची आवाज़ में चिल्लाता हुआ
वो गुज़र रहा है गलियों से मेरे

मैं नहीं सुन पा रहा उसे
दसवें माले पर रहता हूँ
काँच की खिड़कियाँ हैं मेरी
ए.सी. के तर्ज़ पर वे
बंद रहती हैं
कानों में मेरे
सहमा सा सन्नाटा
बैठा रहता है
या कभी हैडफ़ोन लगा
सुन लेता हूँ शोर, सर झुकाकर

सिर पर गठरी बांधे
ऊँची आवाज़ में चिल्लाता हुआ
वो गुज़र रहा है गलियों से मेरे
मगर नहीं सुन पा रहा हूँ उसे
अफ़सोस! बाहर गलियों में गुज़रते
या पेड़ पर बैठे किसी पंछी की पुकार
मुझ तक नहीं पहुँचती ।

उसकी गठरी में क्या है –
मैं नहीं जानता
न जानने के इस कौतुहल को भर रही है
कुल्फी की खुशबू
जिसकी आवाज़ घंटी जैसी है
स्कूल की घंटी जैसी
कि छुट्टी हो गई, आओ खेलें !

कि अचानक माँ
ठूँठ से पैसे निकाल
कर रही है मोल भाव
‘हरेक माल’ बेचते भईया के साथ
और बाबा समझा रहे हैं
मिट्टी का तेल बेचते चचा को
इराक की पॉलिटिक्स
घर बुलाकर

वो अब मेरे घर नहीं आता
नीचे कुछ पालतू कुत्ते तैनात हैं
जिन्हें पुचकारो तो भौंकते हैं
आवाज़ पहले से ऊंची कर;
ये रस्सियों से बंधे जानवर
किसी के सगे नहीं

सिर पर गठरी बांधे
ऊँची आवाज़ में चिल्लाता हुआ
वो गुज़र रहा है गलियों से मेरे
नहीं सुन पा रहा हूँ उसे
मगर सुनी है चीखें पहले भी –
जानता हूँ कि चिल्लाना
मनुष्यता की प्राचीन पुकार है…

अचानक खिड़की पर
एक कविता दृश्य खिंच जाता है –
गाता हुआ एक पंछी
कलगी पर स्मृतियाँ बांधे
आ टकराता है काँच की बंद खिड़की से
और अन्दर से ताकते
असहाय कवि की
मौत होती है ।

– सौरभ राय

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