छुट्टियों में घर

छुट्टियों में घर चला
अपने घर अपने बाबा के घर चला
उतना चला जितना घर मेरा था
साल में एक बार घर मेरा घर था
घर का एक कमरा कमरे का एक टेबल
टेबल से छिटकी रोशनी मेरी थी
टेबल से दूर होता अँधेरा मेरा था

छुट्टियों में घर को फुर्सत थी मुझे अपनाने की
और मुझे फुर्सत थी अपना लिए जाने की
जिस घर में मैं पैदा नहीं हुआ, बड़ा नहीं हुआ
वह घर मुझमें पैदा होने की
बड़े होने की पुरज़ोर कोशिश कर रहा था

घर से मेरे पसंद की खुशबू आ रही थी –
आज मेरे पसंद की चिकन करी बनी होगी
की जायेगी मेरी पसंद की बातें
शहरी छोरा गाँव में नए कपड़े पहनकर
मैं बन जाऊंगा यहाँ का राजा बाबू
छोटी चीज़ों के बड़ी बातें ढूंढता
मैं बच्चों से बतियाऊंगा सबको पसंद आऊंगा…

घर के बाहर का रास्ता मेरी परछाई थी
शांत ठंडी काली टेढ़ी मेढ़ी सी
रास्ते में जगह जगह गड्ढे थे
अपने रोज़मर्रा के झमेलों में डूबे हुए
कुछ से अनजान कुछ मैं भूल चुका था
मेरे गड्ढों में पानी नहीं कीचड़ था
अपनी परछाई पर चल
घर का दरवाज़ा खटखटाता मैं सोच रहा था
किसी अनजान आदमी ने दरवाज़ा खोला तो क्या कहूँगा?

मेरा घर मुझमे प्रवेश कर रहा था ।

– सौरभ राय