टाइप थ्री सोलह सी बोकारो रेलवे कॉलोनी

छोटे छोटे स्टेशन देहाती
इधर से राधागांव
उधर से तुपकाडीह
बीच में एक पूरा शहर
घर
जहाँ प्रवेश करती हैं स्मृतियाँ
दरवाज़े पर खड़े आदमी के बगल से
उसे बाबा से कोई काम है
और बाबा व्यस्त हैं काम में
माँ कहती है शराबी है
वह कहता है बाल बच्चों वाला
और नहीं चाहता है सस्पैंड होना…

कमरे के अन्दर टीवी पर
दिखाई पड़ते हैं दूरदर्शन के बिम्ब
कोई खबर सुना रहा है
और डरा नहीं रहा
बगल बरामदे पर पुरानी साइकिल रखी है
छुओ तो खड़ खड़ आवाज़ करती है
नहीं छुओ तब भी

रसोई से आती मछली की गंध में बिल्ली ने हस्तक्षेप किया है
और आ गिरा है बर्तन स्वेटर बुनती माँ के
एकांत में

गेंद की ढब ढब आवाज़
कमरे की दीवार पर गहरे निशान छोड़ती है
खिड़की से मैं देख रहा हूँ पड़ोस के बच्चे को
खेलने का वक़्त हो रहा है?

घर की कलाई पर सूरज बंधा है
चार बजते ही बाहर की दीवार पर
ईट की खड़िया से विकेट का दृश्य खिंच जाएगा
जंगल में उड़ाकर मारना आउट होगा
हम लड़ेंगे कि जंगल कहाँ शुरू होता है
और घर चले जाएंगे।

कमरे का पंखा घूमता है
और जब नहीं घूमता तब बिजली के आने को
सबसे अधिक उत्सक दिखता है
बल्ब और टीवी से अधिक उत्सुक

खिड़की से हवा अन्दर चली आती है
कैलेंडर हल्का हिलता है
उस साल खूब बारिश होती है
आसमान और ज़मीन के बीच
सभी दृश्यों में पानी भर जाता है
और दीवार पर जमने लगती है
काई की परत

खिड़कियाँ नहीं खुलती कई दिनों तक
पीछे नाना जी के कमरे से आती है
नस्सी की गंध
उनके नाक पर पड़ने लगती हैं झुर्रियां
किसी सूखते पत्ते की तरह
जो अटका रहता है
उनके चहरे पर

नाना जी की याद में
मुझे लगातार छींक आती है

स्मृतियों में समय स्टेशन पर खड़ी ट्रेन से भी धीरे चलता है ।

– सौरभ राय

Advertisements