भूला हुआ फ़ोन

सुबह का समय था
और दिन लगभग ढल रहा था
फ़ोन का न होना
मेरी अनुपस्थिति में लिखी गई एक रिक्त कविता थी
जिसे पढ़ता हुआ मैं आदतन झाँक रहा था फ़ोन में
जेब टटोलने की तरह ।

मेरे सोचे-लिखे गए तमाम बिम्ब
कैद थे उस ब्लैक बॉक्स में,
और मैं हज़ारों मील दूर
अंतरिक्ष में तैरता एक हवाई जहाज़ था
जिसका संपर्क टूट चुका था
व्याकरण के सभी नियमों से।

मैं अपने भूलने की आदत को
याद कर रहा था
और फ़ोन कर रहा था खाली घर की दीवारों से
मेरी मौजूदगी की बातें;
सोफे के पास पड़ा वह
आज नहीं पहुंचा पा रहा था
मेरे ऑफिस देर से पहुँचने की खबर;
बॉस को कॉल कर फ़ोन कर रहा था
अराजकता की तुकबंद बातें
किसी पुराने दोस्त का कर रहा था जमकर तिरस्कार
और भर रहा था पत्नी को आशंका से ।

सिग्नल पर पुलिस वाले को देख
मैं फ़ोन की तरह झन्ना रहा था
मुझे पुलिस का नंबर याद नहीं था
पुलिस के खिलाफ पुलिस में शिकायत करने का यह रूपक
कविता पर कविता लिखने जैसा बेतुका था
मेरी जेब में लाइसेंस था
पुलिसवाले की जेब में फ़ोन !
मेरा यह पापबोध
सिग्नल की तरह रंग बदल रहा था
और किसी बिछड़ी प्रेमिका के फ़ोन कॉल की तरह
मेरी भाषा को मिल रहा था
लिखे जाने का साहस ।

ऑफिस में प्रवेश करता हुआ
मैं फ़ोन का दबा हुआ एक बटन था
और स्क्रीन पर लगातार छपता जा रहा था
आआआआ……

– सौरभ राय

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