Category Archives: हिंदी

कागज़ी जिजीविषा और भारतीय किसान

sourav-roy-farmer-suicideस्कूल के दिनों में ‘राष्ट्रगान‘ नाम की एक कविता लिखी थी। हालाँकि jargon में लिखी गई यह कविता काफी एमेच्यूर थी और शायद इसी वजह से कुछ मित्रों के बीच विवादित भी रही, लेकिन इस कविता की कुछ पंक्तियाँ केवल सन्दर्भ स्थापित करने के उद्देश्य से साझा करने की इजाज़त चाहूँगा –

जहां मिट्टी के कीड़े, मिट्टी खाकर, मिट्टी उगलते हैं
फिर उसी मिट्टी पर छाती के बल चलते हैं
जहां कागज़ पर क्षणों में फसल उगाए जाते हैं
और उसी कागज़ में आगे कहीं वे
गरीबों में जिजीविषा भी बंटवाते हैं Continue reading

जिजीविषा और मुमुक्षा : शी लिजी की कविताएँ

sourav-roy-xu-lizhiराजकमल चौधरी ने ‘मुक्ति-प्रसंग’ के बारे में लिखा है – ‘मैंने अनुभव किया है, स्वयं को और अपने अहं को मुक्त किया जा सकता है।… इस अनुभव के साथ ही, दो समानधर्मा शब्द – जिजीविषा और मुमुक्षा – इस कविता के मूलगत कारण है।’ चीनी कवि शी लिजी की कविताओं को पढ़कर भी कुछ ऐसा ही महसूस हुआ। लेकिन यह कवि अस्पताल नहीं कारखाने में मर रहा है, जिसकी कविताएँ असेंबली लाइन के शोर और शयनागारों के सन्नाटे को चुपचाप समेटतीं हैं। Continue reading

एक लेखक की मौत

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लेखक पेरूमल मुरुगन के खुदको मृत घोषित करने के एक वर्ष के भीतर पंसारे और कलबुर्गी जैसे रेशनलिस्ट हमारे देश में बढ़ रही फासिस्ट ताकतों के हाथ मारे गए। विरोध का दमन हमारे देश में कई सालों से होता आया है। वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ के अनुसार ग्रामीण भारत में अपने हक के आवाज़ उठाना अक्सर आपको मुसीबत में डाल सकता है। ज़मीन छिनने पर अगर किसान आवाज़ उठाए, तो उसे माओबादी करार कुचल दिया जाता है। इसी क्रूर दोषारोपण का एक नया रूप हम इन दिनों शहरों में देख रहे हैं, जहाँ सत्ता पक्ष और उनके समर्थक हर प्रश्न पूछने वाले को देशद्रोही करार देने को तुली है। बहरहाल, लेखक मुरुगन के सन्दर्भ में पिछले साल कुछ लिखा था जो इंडियारी का पहला सम्पादकीय भी था। कुछ संशोधनों के साथ इसे प्रिय पाठकों के साथ दोबारा साझा कर रहा हूँ।


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दृश्य में दर्शन की तलाश : कोबायाशी इस्सा के हाइकू

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कोबायाशी इस्सा (1763 – 1828), जिन्हें इस्सा के नाम से भी जाना जाता है, जापानी हाइकू के चार स्तम्भों में गिने जाते हैं, जिनमें इनके अलावा मात्सुओ बाशो, योसा बुसोन और मासाओका शिकि भी शामिल हैं। जापान में इस्सा हाइकू के जन्मदाता माने जाने वाले बाशो जितने ही लोकप्रिय हैं। बाशो से एक शताब्दी बाद जन्मे इस्सा को हाइकू की रूढ़िवादी प्रथा का विधर्मी माना गया है। जहाँ बाशो ने अपने रहस्यवाद और बुसोन ने अपने विलक्षण सौंदर्यवाद से हाइकू की परंपरा को समृद्ध किया है, वहीं इस्सा की असाधारण करुणा इन्हें हाइकू के नवजागरण और आधुनिकीकरण का महत्वपूर्ण कवि बनाती है। Continue reading