Category Archives: हिंदी

बचपन और कविताएँ : कार्यशाला के कुछ नोट्स

श्रीमती कमला सकलेचा ज्ञान मंदिर मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले के भानपुरा गाँव में स्थित है। साल 2016 में इस स्कूल में मेरा तीसरा प्रवास पूरा हुआ। आईआईटी की तैयारी के लिए मशहूर कोटा शहर से डेढ़ घंटे की दूरी पर स्थित होने के बावजूद चम्बल नदी के किनारे बसा भानपुरा और आस पास के गाँव काफी पिछड़े हुए हैं। मार्च की गर्मी में सुबह की प्रार्थना के समय स्कूल की छात्राओं को सिर चकराकर गिरते देख महसूस होता है कि स्वास्थ्य और पोषण के मामले में ये ज़रा पीछे छूट गए हैं। मेरे बचपन की सहपाठी लड़कियाँ इनसे काफी सेहतमंद हुआ करती थीं। Continue reading

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योसा बुसोन की कविताएँ

योसा बुसोन (1716-1783) को जापानी हाइकु के चार स्तंभों में गिना गया है। जापान में बुसोन से बड़े कवि एकमात्र मात्सुओ बाशो (1644-1694) ही हैं। बाशो को जापान के महानतम कवि के रूप में स्थापित करने में बुसोन और इनके साथियों की बड़ी भूमिका थी। कवि के अलावा बुसोन एक विलक्षण चित्रकार और खुशनवीस भी थे। बुसोन और इनके साथियों ने मिलकर हाइकु के इतिहास को खंगाला, और बाशो समेत कई पुराने कवियों को ये काव्य की मुख्यधारा में लेकर आये। इन्होंने एक लम्बा और स्वस्थ जीवन जिया। Continue reading

डुबुक!

जापान के प्रसिद्द कवि मात्सुओ बाशो (1644-1694) ने साल 1686 में अपनी सबसे प्रसिद्द कविता ‘पुराना तालाब’ की रचना की थी। कविता की रचना-प्रक्रिया को याद करते हुए इनके शिष्य शिको ने लिखा है, “यह कविता वसंतकाल में लिखी गई थी। हमारे गुरु आँगन में बैठकर हलकी बारिश के बीच कबूतरों की आवाजें सुन रहे थे। हवा थोड़ी तेज़ थी, और चेरी की पंखुडियां रह-रहकर ज़मीन पर आ गिरतीं। वसंत के आखिरी दिनों का ख़ूबसूरत मौसम, जब आप चाहते हैं कि वक़्त ठहर जाए और दिन कभी ख़त्म न हो।”

आगे लिखते हैं, “थोड़े-थोड़े समय पर बगीचे में मेंढकों के पानी में छलांग लगाने की आवाज़ सुनाई पड़ती।

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वे कह सकते हैं कि भाषा की ज़रुरत नहीं होती

वे कह सकते हैं कि भाषा की ज़रुरत नहीं होती
साहस की होती है
फिर भी बिना बतलाये कि एक मामूली व्यक्ति
एकाएक कितना विशाल हो जाता है
कि बड़े-बड़े लोग उसे मारने पर तुल जायें
रहा नहीं जा सकता

– रघुवीर सहाय, दो अर्थों का भय’ कविता से

जर्मन दार्शनिक लुडविग विट्गेंस्टाइन के मुताबिक हमारी चेतना हमारी अभिव्यक्ति से पुरानी है। Continue reading

ईश्वरीय सत्ता को चुनौती और भारतीय परंपरा

कुछ दिन पहले मथुरा में स्वामी बालेन्दु द्वारा आयोजित नास्तिकों के एक सम्मेलन के निरस्त कर दिए जाने की ख़बर सामने आई। सम्मलेन के विरोध में संत, महंत, और इमाम एकजुट होकर खड़े हो गए। मथुरा में धार्मिक गुटों का उन्माद और आक्रोश देखकर जनपद में धारा 144 लगाने का निर्देश पारित किया गया। विवाद से पहले स्वामी बालेन्दु ने एक फेसबुक पोस्ट के ज़रिये सम्मलेन के आयोजन का उद्येश्य स्पष्ट किया था जिसमें उन्होंने समाज में धर्म के नाम पर फैले अधंविश्वास और पाखंड को दूर करने के लिए शिक्षा और वैज्ञानिक सोच के आधार पर भविष्य को गढ़ने की इच्छा जताई थी। आयोजन के रद्द कर दिए जाने के बाद उन्होंने फेसबुक पर लिखाContinue reading

सुनकर क्‍या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्‍मकथा?

दांते ने कहा था कि हर लेखक अपने लेखन के ज़रिये अपनी कहानी सुना रहा होता है। या दूसरे शब्दों में कहें तो हर लेखक अपनी आत्मकथा लिखता है। यह बात केवल दांते के समय और समाज पर लागू नहीं होती। आदिकवि और वेदव्यास अपने ग्रंथों के रचयिता ही नहीं, उनकी घटनाओं के साक्षी भी रहे हैं। भर्तृहरि से लेकर निराला, अज्ञेय, और शमशेर सरीखे कवि भी अपनी बात कहते नज़र आते हैं। कविता में यह विचार कई तात्कालिक प्रश्नों के रूप में भी देखने को मिलता है – चाहे वह कविता में मौलिक अनुभवों का प्रश्न हो या कवि के अहम् की तलाश का। कविता में पाठक स्वभावतः कवि को ही देखता है। Continue reading

भाषा के नए प्रश्न

sourav-roy-old-manहिंदी में एक कहावत है – “कोस कोस पर पानी बदले, चार कोस पर बानी।” हम इस बात को अक्सर बड़े गर्व से कहते हैं, मगर क्या हर चार कोस में भाषा का बदलना हमारे पिछड़ेपन का प्रतीक नहीं? क्या यह नहीं दर्शाता कि भारत की एक बहुत बड़ी जनसँख्या अपने चार कोस की सीमा से बाहर निकल ही नहीं पाती है? निकलने की ज़रुरत भी शायद नहीं पड़ती है। इसी चार कोस के गांवों में इनके तमाम आत्मीय, मित्र मिल जाते हैं। इसी चार कोस के दायरे में इनकी खेती-बाड़ी, शादी-ब्याह, व्यापार, बाज़ार इत्यादि की ज़रूरतें भी पूरी हो जाती हैं। मगर क्या भाषाओं का अपने अपने चार कोस के वृत्त में सिमटे रहना गर्व की बात है? Continue reading