Monthly Archives: November 2018

डुबुक!

जापान के प्रसिद्द कवि मात्सुओ बाशो (1644-1694) ने साल 1686 में अपनी सबसे प्रसिद्द कविता ‘पुराना तालाब’ की रचना की थी। कविता की रचना-प्रक्रिया को याद करते हुए इनके शिष्य शिको ने लिखा है, “यह कविता वसंतकाल में लिखी गई थी। हमारे गुरु आँगन में बैठकर हलकी बारिश के बीच कबूतरों की आवाजें सुन रहे थे। हवा थोड़ी तेज़ थी, और चेरी की पंखुडियां रह-रहकर ज़मीन पर आ गिरतीं। वसंत के आखिरी दिनों का ख़ूबसूरत मौसम, जब आप चाहते हैं कि वक़्त ठहर जाए और दिन कभी ख़त्म न हो।”

आगे लिखते हैं, “थोड़े-थोड़े समय पर बगीचे में मेंढकों के पानी में छलांग लगाने की आवाज़ सुनाई पड़ती।

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वे कह सकते हैं कि भाषा की ज़रुरत नहीं होती

वे कह सकते हैं कि भाषा की ज़रुरत नहीं होती
साहस की होती है
फिर भी बिना बतलाये कि एक मामूली व्यक्ति
एकाएक कितना विशाल हो जाता है
कि बड़े-बड़े लोग उसे मारने पर तुल जायें
रहा नहीं जा सकता

– रघुवीर सहाय, दो अर्थों का भय’ कविता से

जर्मन दार्शनिक लुडविग विट्गेंस्टाइन के मुताबिक हमारी चेतना हमारी अभिव्यक्ति से पुरानी है। Continue reading