जनोक्ति

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यह लेखनी कैसी कि जिसकी बिक गयी है आज स्याही !
यह कलम कैसी
कि जो देती दलालों की गवाही !
पद-पैसों का लोभ छोड़ो , कर्तव्यों से गाँठ जोड़ो ,
पत्रकारों, तुम उठो , देश जगाता है तुम्हें !
तूफानों को आज कह दो , खून देकर सत्य लिख दो ,
पत्रकारों , तुम उठो , देश बुलाता है तुम्हें !

देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत, एवं समाज के उत्थान के लिए तत्पर जनोक्ति एक ऐसा मंच है जहाँ जनता को आवाज़ मिलती है | देश भर के श्रेष्ठ हिंदी के लेखक, पत्रकार एवं साहित्य के सृजनकर्ताओं की कर्मभूमि है जनोक्ति | मेरे लिए यह अत्यंत गौरव की बात है की मैं इनके लिए लिखता हूँ |

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