सपनों से भरी इस रात में
मैं अकेला!!
दसों ज्ञात दिशाओं में
स्वयं को तलाश कर
संवेदित हो
हार कर
जाग रहा हूँ |
मेरा प्रतिबिम्ब
कांच के टुकडों सा
तड़-तड़
टूट चुका है |
ह्रदय में एक ज्वार है |
खुली खिड़की से बाहर झांकता हूँ…
बादलों में ख़ुद को देखता हूँ
प्रेम की प्रबल कामना
और तृष्णा के निर्जन द्वीप पर
बिलकुल अकेला !!
चंद्रमा उधार की रौशनी से
पृथ्वी को लुभा रहा है |
चांदनी की गुमसुम गरज
साथ लिए कुछ
उलझी झाड़ियाँ, लताएं और अतृप्त तृष्णाएं !!
बाहर बगीचे में कुछ झींगुर…
चिर्र-चिर्र… किर्र-किर्र…
कुछ मेरे भीतर भी
वो मुझे सताते
मुझे रुलाते
मुझे हंसाते |
मेरी आँखें धरती की सीमा लाँघ
तारों के संग अन्तरिक्ष में
टिमटिमा रहीं हैं
हरी नीली चमकीली पृथ्वी में
किसी को तलाश रहीं हैं |
किसे ?
पता नहीं !!
मेरी मुस्कराहट के पीछे
एक पपड़ी सी उदासी है |
मेरी उदासी के पीछे
बच्चे सी खिलखिलाती एक हंसी |
उपन्यास में जीवित लोगों के बारे में पढ़ता हूँ…
जीवित लोगों से मिलना भी चाहता हूँ |
नभ पर कुछ सिलवटें दिखीं…
मेरी शिकन से तुझे क्या ?
हाँ शिकन
कोर्स के खेत में
जैसे बिजूका |
क्षितिज से क्षितिज तक खेत
और अकेले बिजूके के माथे पर शिकन |
वो बहता पसीना
माटी कितनी जल्दी सोखता है |
जैसे नभ की संजोयी बिजली को
अर्थिंग के तार !
अँधेरे से भी काला
वो सामने वाला नन्हा पौधा
देखते ही देखते वृक्ष बन जाता है
और कोई उसे काट गिराता है |
एक से अनेक
फिर मात्र एक
और फिर शून्य !!
केवल अँधेरा |
सड़क पर से कोई ट्रक गुज़रता है
उसे अपनी मंजिल का पता है |
मेरी…??
दूर घर में लाइट जल रही है
कोई पढ़ रहा होगा..
मेरी तरह !!
मेरी तंद्रा टूटती है
किताब का वही पृष्ठ
खुला का खुला
नभ में घटित रामलीला का
पर्दार्पण होता है |
उसे बंद कर
सो जाता हूँ ||
-Sourav Roy “Bhagirath”






