छोटी सी मोटी सी काया
और उतनी ही चुस्त !
सुबह जाने कब उठ जाती
और ठंड में ठिठुरते हुए
धो डालती सारा घर
नहाती ठंडे पानी से
फिर भी गोद कितनी गर्म-मुलायम
टीवी पर जाने क्या-क्या सीख लेती -
पकवान-योग-प्राणायाम
और दिन भर करती दार्शनिक सी बातें
हर दिन एक नए भगवान की पूजा करती
और रखती उपवास
टीवी पर न्यूज़ देखते बाबा को
मासूम सा चेहरा बनाकर कहती -
” सीरियल वाला चैनल लगाइए ना “
पड़ोसनों के संग
दोपहर को बैठ जाती धूप में
सबके बच्चों के बारे में सुनकर
उनकी ख़ुशी में खुश होती
और फिर शाम को पूजा करते वक्त
गुमसुम सी मुझे याद करती |
चूल्हे पर खाना पकाते वक्त
तेरा चेहरा रोटी सा दमकता
और जब कोई तेरे पकवान की तारीफ़ करता
तो उसे खिला देती खूब सारा !
हर रात फ़ोन पर मुझसे वही सवाल पूछती
और देती वही-वही हिदायतें
और मेरी तबियत बिगड़ने पर
जाग जाती रात भर कुछ सोचते हुए
कितनी खुश हो जाती तू
जब बाबा तुझे बाहर लेकर जाते
हमेशा बाबा के पीछे चलने वाली
मेरे घर लौटने पर
चौखट पर खड़ी हो जाती
बाबा के सामने ||
-Sourav Roy “Bhagirath”












