मंदिर में
हज़ारों की भीड़ में
मांगने वालों की भीड़ में
भिखारियों की भीड़ में |
पत्थरों के अहाते में भगवन
सजे धजे भगवन
कपड़े पहना पत्थर…!
सैकड़ों जोड़ी जूतों तले लदे हम
नंगे पैरों के जानवर |
पुरोहित पैसे लेकर आगे बढ़ने देते
मैं पैसे देकर आगे बढ़ जाता |
हवा में लात घूंसे घुमा भीड़ आगे बढ़ जाती |
मन में भक्ति और आशंका |
बहुत से लोग थे
लोगों की भीड़ में |
लोग जो रेंगते थे
( नंग धड़ंग बच्चे -
जो भगवन में विश्वास करते थे !
बूढी स्त्रियाँ जिनके दामन में झुर्रियां थीं;
आँखों में धुंधले आंसू
दुखों की पारदर्शी महँगी साड़ी में लिपटे
जो भगवन में विश्वास करते थे ! )
ऐसी ही एक बुढ़िया
मेरे पास बैठ आंसू बहाती
जाने कैसे शब्द दुहराती ?
शब्द जिनके अर्थ नहीं होते
कुछ लोग रोकर भी नहीं रोते |
मैं उसे अनदेखा कर देता
( मुझे भी काफी कुछ माँगना था )
मेरे पीछे भक्तों की भीड़
भिखारियों की भीड़ |
किसी ने पुरोहित को सौ का नोट दिया
“हमें आगे आने दें”
पुरोहित ने मज़बूत हाथों से
बेकाबू तोंद से
मुझे धकेला
बुढ़िया को धकेला
पूरी भीड़ को धकेला
( असली लोगों की भीड़ को धकेला )
मैं बुढ़िया को बचाता भीड़ पर गिरा |
वो पिछले जन्मों के पापों को रोती बचाती
पत्थर के फर्श पर गिरी |
रोती हाय हाय करती
मरी नहीं
खून खून हुई |
पुरोहित ने उसे लात से खिसकाकर
वहां सभ्य लोगों की जमात लगाई |
मरी नहीं वो ! मैंने उसे उठाया
वो मुस्कुराई ( तिरछी अजीब मुस्कान )
भीड़ में खो गयी |
मैंने पुरोहित को मारना चाहा
माँ ने हाथ पकड़ लिया
“इन्हें भगवान् सज़ा देगा” विश्वास करो |
मैं भगवान् में विश्वास नहीं करता ||
-Sourav Roy “Bhagirath”












