बोकारो

छोटे छोटे स्टेशन देहाती
इधर से राधागाँव
उधर से तुपकाडीह
बीच में गलियाँ
जहां छोड़ आया मैं
खुदको
दोस्तों संग
साइकिल पर
घंटों का रास्ता
मिनटों में तय करते हुए |
जहां साढ़े चार बजे
मैं आज भी दोस्तों को आवाज़ देता हूँ -
सोनू ! बाबू !

जहां माँ आज भी शाम को
पड़ोसन
नहीं बहन के संग बैठकर
बुनती है गर्म स्वेटर |
जहां खिड़की की ओर नज़र कर
कल डराकर सुलाया था माँ ने मुझे -
बाहर
लोमड़ी
बैठी
है |
वो खिड़की अभी जाने किसे सुलाती होगी ?

जिसे आज भी मैं अपना घर मानता हूँ
नहीं ये मेरा घर नहीं है |
वक़्त नहीं थमता
कदम थमते हैं |
वक़्त क्यों नहीं थमता ?
ग़र थमता तो रोक देता उसे |
गेंद से दीवाल पर खेलता था
जाने वो निशां मिटे होंगे कि नहीं ?

वहीँ ज़मीन पर
नींबू का घाना मंडप
जिसमे कोई अकेला नींबू
टूटने से छूट जाता
और तब दिखलाई देता
जब पककर लाल बहुत हो जाता -
जैसे मेरे(?) आँगन में
सुबह को शाम का सूरज
या शायद
शाम को सुबह का सूरज
छूटकर रह गया पूरब में |

छूटकर रह गया वहां दिन
छूटकर रह गया मेरा दिन वहां
जैसे मैं छूटकर रह गया वहाँ ||

-Sourav Roy “Bhagirath”

One Response to बोकारो

  1. HARE KRISHNA PATHAK

    hi,
    sourav roy
    I am presently working in Desh live tv news channel as a Seniour Cameraman in Ranachi.

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