स्वच्छ आकाश में
आधा अधूरा चाँद
और उसकी पूरी चांदनी
जैसे मेरी अनपढ़ी ज़िन्दगी के चारों तरफ
मैं |
मैंने आधी रात में भी
तुझपर सूरज को चमकते देखा है
आ ! मैं तेरी चांदनी ले कर
तुझे प्यास बोध दिए देता हूँ
तेरे अनचूमे होंठों को
मुक्ति बोध दिए देता हूँ
तेरे साथ जीकर – मरकर
तुझे नारी बोध दिए देता हूँ
तुझसे प्यार करता हूँ
खिलवाड़ नहीं
यही एक आखरी शर्त है
ज़िन्दा रह जाने की ||
-Sourav Roy “Bhagirath”













very nice poetry