तुम्हारी आँखों में
कैसी परतें हैं ?
या बंद खिड़की पर
लहराते धुंधले परदे हैं ?
परदे जिनपर नदियाँ बहती हैं
और पहाड़ों टीलों से गुज़रकर
सकुशल किसी सागर से जा मिलती हैं
सागर जिसके उस पार
सूरज डूबता है शाम को
और तुम्हारी आँखों में दिन ढलता है
सागर जिसके उस पार
सूरज डूबता है शाम को
और रात भर तुम्हारी आँखों कि परिक्रमा कर
अगले भोर परदे कि उलटी तरफ से
वही सूरज निकल आता है
फिर कहीं कोयल गाती है
और अंगड़ाई लेकर खुलती हैं
तुम्हारी आँखें
इस खुलती खिड़की के
उस पार कि धूप में
परदे कि आड़ में दिख जाता है
खेलता बचपन
शर्माता यौवन
एक सम्पूर्ण जीवन !
इस खुलती खिड़की पर से
लहराते परदे को
आज आहिस्ता से
आहिस्ता से मैंने हटाया
आज फिरसे तेरा नाम काग़ज़ पर लिखकर
मुस्कुराकर मैंने मिटाया ||
-Sourav Roy “Bhagirath”






