द्वारका

पोरबंदर के महात्मा
मदिरा त्याग कर गए
हूच के मज़दूर
दारू पी कर मर गए

द्वारकाधीश
लड़ रहा है महाभारत
हस्तिनापुर जाकर |
राम ख़ुश है
रहीम को जलाकर |
आदमी कहता है – ‘छोड़ दो हमें’
मुल्ला कहता है – ‘फोड़ दो बमें’
आदमी कहता है – ‘छोड़ दो हमें’
पंडित कहता है – ‘फोड़ दो बमें’
दहशत या की वहशत ?
आदमी नहीं बताएगा
मरने का ख़तरा है |

गले में समुद्र लिए
भागता ही आदमी
आग लगी है
गलियों में
कुचला गया शिशु
रथ के पहिये के नीचे
टूटते हैं पहिये
कटता है गला
समुद्र बहता है
फ़व्वारे सा |
फटता है बम
समुद्र फ़ुट पड़ता है
गलियों से |
गोली लगती है
शेर को
दहाड़ता है – ‘समुद्र’
मज़दूर दारु पीकर डकारता है-
‘ये शराब नहीं समुद्र है !’
मंदिर से मस्जिद तक
फैला है समुद्र !
‘अरे भूलो समुद्र को !
कर्मनेवाधिकारस्ते…’
द्वारकाधीश कह रहा है
समुद्र से उभरा देश
वापस समुद्र में ढह रहा है ||

-Sourav Roy “Bhagirath”

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