दो रास्ते

उम्मीदों पर से ख़्वाबों का चश्मा जब तक उतरा
वह गरीब हो चुका था
और बेरोज़गार भी |
संग हंसने वाले खो गए थे
और जिन पर वह हंस सकता था
वो हंस रहे थे |

पढ़ा लिखा था-
मज़दूरी करता तो लोग क्या कहते ?
उसके सामने दो ही रास्ते बचे थे-
पहला रास्ता था-
आतंकवादी बन
लोगों को मारना-लूटना
मौज से जीवन जीना
और फिर पुलिस की गोली का शिकार बन जाना |
यह रास्ता उसे अपने स्वभाव
और पारिवारिक परंपरा के विरूद्व लगा

इसीलिए उसने दूसरा रास्ता अपनाया
और आत्महत्या कर ली !

-Sourav Roy “Bhagirath”

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