अभी यहाँ…

अभी यहाँ
मैं बैठा हूँ
अभी यहाँ
तुम होती
अभी यहाँ
समंदर किनारे हम टहल रहे होते
और समंदर हमारी धड़कन सुन रहा होता
अभी यहाँ
ऊपर वो चाँद और तारों से सजा आकाश
हमारे संग दौड़ रहा होता
हमारा हाथ थामे
अभी यहाँ कोई नहीं होता
और मैं तुम्हारी आँखों में डूब जाता
और ये गाती गुनगुनाती ज़िन्दगी
यूं ही बीत जाती
अभी यहाँ
दुनिया ठहर जाती
सब कुछ धीरे धीरे हमारा हो जाता
ये दुनिया हमारी हो जाती
और हम एक दूसरे के हो जाते
अभी यहाँ
एक तारा टूटता
और हम एक दूसरे को मांग लेते
और वो तारा भी हमारा हो जाता
अभी यहाँ
तुम नंगे पाँव दौड़ती चली आती
और मैं तुम्हे देखता
और तुम सच्चे झूठे बहाने बना
मुझसे लिपट जाती
अभी यहाँ
मैं तुम्हे जगाता
तुम्हारी जुल्फों की लटों को सुलझाता
और तुम आँखें खोल
मुझे देखती
अभी यहाँ
मैं मर रहा होता
और तुम्हे अगले जन्म में फिर मिलने का वादा कर
मैं सुकून से तुम्हारी बाँहों में मरता
अभी यहाँ
मैं बैठा हूँ
काश यहाँ
तुम होती !

- सौरभ राय 

2 Responses to अभी यहाँ…

  1. ऊपर वो चाँद और तारों से सजा आकाश
    हमारे संग दौड़ रहा होता
    अभी यहाँ /
    एक तारा टूटता
    और हम एक दूसरे को मांग लेते
    और वो तारा भी हमारा हो जाता//

    ख़याल बहुत ख़ूबसूरत है….

  2. Lovely sourav ji.. one of the most romantic poem i have ever read. Today i discovered your blog and already i am in love with it.
    http://digbhramit.wordpress.com/

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