पड़ोस के घर का बच्चा
छोटी सी सुंदर नाक, छोटा सा मुँह प्यारा,
निष्कपट मन,
खेल का शौकीन |
थोड़ा भोलापन, कुछ नासमझी
बहुत गहरी नींद उसकी
भविष्य के गर्भ में उलटा पड़ा हुआ
वर्तमान में पैदा हुआ |
सपनों के नाम पर सपनों का झुनझुना
जिसको बजाते ही बगीचे से सारे गाछ नाच उठते हैं |
नहीं चाहिए चाँद उसे
वो खुद ही चाँद सा प्यारा |
उसके विचार सूखे नहीं हैं
मन पपड़ाया नहीं है |
क्योंकि नहीं चाहिए चाँद उसे
वो सपनों से ही खुश है |
अभी कल की बात
मैं नयी कविता के बारे में सोच रहा था
अचानक खिलखिलाता वो
नंगधडंग दौड़ता
निकल आया घर से बाहर
पीछे – पीछे
हाथ में चड्डी लिए
दौड़ती उसकी मम्मी आई हँसती चिल्लाती |
“आँटीजी ज़रा धीरे चलो-
बुढ़ापे में बेटे के पीछे नहीं दौड़ पाइयेगा |
कच्छा किसे पहनाइयेगा?”
मुझे बच्चे बड़े ही अच्छे लगते हैं ||
-Sourav Roy “Bhagirath”













very nice man…especially liked the part “क्योंकि नहीं चाहिए चाँद उसे
वो सपनों से ही खुश है |”…look forward to reading more of your work.
best wishes.
Rohit Dubey