जाने सूरज इतने दिन
पृथ्वी के चारो तरफ
किन रास्तों से होकर गुज़रा |
हमारी परछाइयाँ दूर हो गई |
आज सब ख़ामोश हैं
इस ख़ामोशी में
कितना सुमधुर सा गीत बजता है
और गुजरता है दूर कोई फलवाला
कहीं रास्ते पर से स्कूटर की आवाज
और हँसता है कहीं कोई बच्चा |
इसी ख़ामोशी में हम आनंदोत्सव मनाते थे
गाते थे गीत जो कभी लिखे नहीं गए
और खरीदते थे अमरत्व के सुनहरे फल
करते थे बादलों के स्कूटर की सवारी
और तुम्हारी हँसी बच्चों की तरह निर्मल
इसी ख़ामोशी में ||
याद आता है
मैंने अपनी कलम से
अपनी हर कविता में
तुम्हे उतारा था
इस गूँजती ख़ामोशी में
तुम्हे पुकारा था
आज जब मैं तुम्हारा नाम तक भूल चूका हूँ
तो क्यों नहीं आती?
नींद में
जब मुस्कुराती है ख़ामोशी
क्यों नहीं आती और कान में कह जाती-
” मैं ज़िन्दा हूँ …मरी नहीं !”
जाने सूरज इतने दिन
पृथ्वी के चारों तरफ
किन रास्तों से होकर गुज़रा
हमारी परछाइयाँ दूर हो गईं |
आओ ! जी उठो कविता से निकलकर
जी उठो ! आओ !
इस खामोशी को तोड़ जाओ
एक और आकाश जोड़ जाओ ||
-Sourav Roy “Bhagirath”












