हमने कोई क्रांति शुरू नहीं की
हमें तो बिगुल बजाना भी नहीं आता !
हमने फिल्म देखी
जो क्रांति से प्रेरित थे
हमने गाने सुने ‘एकला चोलो रे’
जो क्रांति ला सकते थे
पर हम ठहरे सीधे सादे
बिगुल भी नहीं बजा सकते थे
हमने इश्क किया
पर लड़ नहीं पाए
हमने मेहनत की
पर जीत नहीं पाए
हम गोली मारकर तो क्या
गोली बनकर भी नहीं मार पाए
हम क्या लायेंगे परिवर्तन
हम तो पड़ोसी की गलतियाँ ढूंढ़ रहे थे
और खुद की गलतियों को छिपा रहे थे
क्रांति जब शुरू हुई
हम बाथरूम जा रहे थे !
हम क्या बदलेंगे समाज
हमसे तो बच्चे का डाईपर भी नहीं बदला जाता
हमने कोई क्रांति शुरू नहीं की
हमें तो बिगुल बजाना भी नहीं आता !
-Sourav Roy “Bhagirath”













आपकी कवितायें मैंने पढ़ी. हमें आप जैसे देश भक्तो की आवश्यकता है.
हम क्या बदलेंगे समाज
हमसे तो बच्चे का डाईपर भी नहीं बदला जाता
हमने कोई क्रांति शुरू नहीं की
हमें तो बिगुल बजाना भी नहीं आता !….
बेहतर…