सामने सड़क पर
आते जाते लोग
और आती जाती सड़क
इसी आने जाने में
कितने लोग गुज़र जाते हैं
मिल नहीं पाते !
ठंडी बयार पर मचलते
थिरकते
सूरजमुखी के फूल
और वो तुलसी का
अकेला नन्हा पौधा
जो छूट गया है
बगीचे में
सड़क किनारे !
वहीँ पास
डालिया के फूल
जो सूख गए हैं
पर नहीं झड़ते हैं
मिट्टी की उपज
मिटटी में मिलने से
डरते हैं !
सामने सड़क पर
साइकिल चलाते
कहीं के लड़के
बात करते हुए
कहीं जा रहे हैं-
“मास्टरजी ने क्या पढ़ाया था कल ?”
यही सड़क
शाम को
क्रिकेट की बाउंड्री
बनती है
और रात को
कुत्तों का अड्डा !
इसी सड़क पर
ज़िन्दगी
गुज़र जाती है
और इसी आने जाने में
सड़क के किनारे मैं
बैठा किसीसे
मिल नहीं पाता |
सामने सड़क पर
आत जाते लोग
कितने दूर नज़र आते हैं
मिल नहीं पाते हैं ||
-Sourav Roy “Bhagirath”












