तुम्हारे जाने पर
घर लौटते पक्षियों के पंख
भींग जायेंगे
और बादलों में जो बचा रहेगा
वो दुःख होगा
दुःख जो हमेशा रहेगा
और बढ़ता जायेगा
जैसे अपने आंत को खींच
चलते चिल्लाते हम
चलते अपने रास्ते
सब चले अपने रास्ते
सब चले अपनी एकाकीपन की रस्सी पर
बिना गिरे
रुकते संभलते
मैं चला जा रहा हूँ
अपनी रस्सी पर
पर…
एक टुकड़ा मेरा
तुम्हारे हाथ में छूट जाता है
और जो बचा हुआ मैं हूँ
तुम्हारे आँखों से गिरकर
टूट जाता है ||
-Sourav Roy “Bhagirath”












