विदर्भ की काली पगडंडी से
गुज़रता है जुलूस
‘राम नाम सत्’ फुसफुसाता
न – न चिल्लाओ नहीं
भूख के मारे
मर जाओगे |
कपास से बीज न मिला
तो क्या हुआ ?
उतार दो
आत्माराम का कफ़न
अथवा डोम चुरा लेगा
जलते शव से
उतार दो
आत्माराम का कफ़न
बना दो धोती
बचा लो ख़ुद को
नंगा होने से
या बना दो रस्सी
बचा लो ख़ुद को
विरक्ति भरी मौत से |
विदर्भ की काली पगडंडी से
गुज़रता है जुलूस
‘राम नाम सत्’ फुसफुसाता
न – न चिल्लाओ नहीं
भूख के मारे
मर जाओगे |
क्या फ़र्क पड़ता है
विदर्भ हो या वियतनाम ?
प्रजा नंगी गुज़री है
शमशान के हर द्वार से
छत टूट चुकी है
तुम्हारे परिवार के भार से
फैसला तुमने नहीं लिया
चुप रहने का मतलब
स्वीकृति नहीं होती
क्या फ़र्क पड़ता है ?
हर किसी का फैसला हो चुका है गर्भ से
प्रसव की चीखें गूंजती हैं
तक्षिला से, अवध से, विदर्भ से |
विदर्भ की काली पगडंडी से
गुज़रता है जुलूस
‘राम नाम सत्’ फुसफुसाता
न – न चिल्लाओ नहीं
भूख के मारे
मर जाओगे |
किसका शव है
क्या फ़र्क पड़ता है ?
जिस किसी का है
उसका नहीं है
शव के बदले चुका लो कर्ज़ा
बो दो शव को खेत में
अथवा बेच दो
कपास बतलाकर
यही करता आया है तुम्हारा सम्राट
न – न जलाओ नहीं
कहीं आत्माराम की दुम
बजरंगबली की पूंछ बनकर
जला कर खाक़ न कर दे
विदर्भ के सम्राट को !
-Sourav Roy “Bhagirath”













किसका शव है / क्या फ़र्क पड़ता है ? / जिस किसी का है / उसका नहीं है
बहुत बढ़िया सौरव जी
nice one