दोनों बाहें फैलाये
भींगती-भिगोती वर्षा में
आँखें भिगो
चमकता है सुनहला धुंध |
मेरे पत्तों से बूँद झरते
टंगे रह जाते |
कुहासे में उजली छटाएं
और कुहसित होते से
मेरे बाहों की नरमी में खिलते
कोंपल वो छोटे से |
छम-छम वर्षा में मैं अकेला पेड़
और मेरी सांस कुहरे की नस्ल की
उम्दा नस्ल, वाकई !
चाहता हूँ-
धूप खिले
फिर से कोई मुसाफिर
मेरी पनाह में रोटी-अचार खाए
लकड़ियाँ काटे |
घर बनाये ||
कट कर किसी का घर बन जाना
अत्यंत सुखद होता है ||
-Sourav Roy “Bhagirath”












