दोपहर के वक़्त
बाग़ में
पेड़ों से छनकर
जब सूरज की
सुनहरी धूप
काग़ज़ पर चमकती है
कितने अजीब नक्शे बनते है !
जैसे अधूरी तस्वीर
किसी अजनबी सिंडरेला की
और हाथ में उसकी शीशे की जूती लिए
मारे मारे फिरते हम सभी !
जैसे…
जैसे जादुई रास्ते
परियों के किसी देश के
और इन रास्तों पर पैदल चल हम
जाने किन खज़ानों तक पहुँच जाते !
दोपहर के वक़्त
बाग़ में
पेड़ों से छनकर
जब सूरज की
सुनहरी धूप
काग़ज़ पर चमकती है
कितने अजीब नक्शे बनते है !
जैसे ख़ामोशी
जो गा रही है
कहना चाहती है अपने रहस्य मुझसे
पर शर्मा रही है !
जैसे…
जैसे बादल
मेरे कलम तले मंडराते
और फिर अनायास ही उमड़ घुमड़
वो मुझपर बरस जाते !
दोपहर के वक़्त
बाग़ में
पेड़ों से छनकर
जब सूरज की
सुनहरी धूप
काग़ज़ पर चमकती है
कितने अजीब नक्शे बनते है !
जैसे चाँद
जिसे मैं देख अनदेखा कर देता
और थोड़ी देर बाद जब मैं उसे ढूंढता
तो कोई काला बादल उसे अपनी बांहों में भर लेता
जैसे अग्नि !
जैसे वायु !
जैसे आकाश !
जैसे धरती !
जैसे तुम !
जैसे मैं !
जैसे हम सभी !
जैसे…
-Sourav Roy “Bhagirath”













अच्छा लिखते हैं.. आप.