शाम के वक़्त
आसमान गहरा नीला
कुछ काला
और क्षितिज
गुलाबी लाल !
बच्चों की तरह
बाहें फैलाकर
गोल गोल घूमो
तीन सौ साठ डिग्री
हर तरफ देखो
क्षितिज
गुलाबी लाल
जैसे आसमान के डोम को
किसीने धरती से
वेल्डिंग करके
अभी अभी
जोड़ दिया हो
काटो इस डोम को किनारों से
या कटने से बचाओ
( तुम्हारी मर्ज़ी )
थोड़ी देर में सबकुछ अँधेरा हो जायेगा ||
तब करना याद
था एक पाग़ल कवि
जो एक कुशल चित्रकार की तरह
छिड़क देता था तारे
इत्ते सारे !!
और कर जाता था हस्ताक्षर
अपने चाँद पर !!
-Sourav Roy “Bhagirath”













बहुत खूबसूरत रचना …
आप सुन्दर लिखते हैं … बहुत से पाठक आपके लेखन से जुड़ सकें इसके लिए अपनी साईट को विभिन्न एग्रीगेटरों पर रजिस्टर करें .जिनमे चिट्ठाजगत और ब्लॉग प्रहरी आदि प्रमुख हैं http://www.blogprahari.com/