आत्मदाह

I
रक्त सिंचित समर मेदनी पर युग पुरुष
मूर्छित बंद चक्षु से अग्निवर्षा देख रहा है;
“जिस युद्ध को जीतने को लोलुप था तू
कहो युधिष्ठिर ! इस मृतागार में तेरा राज्य कहाँ है ?
किस पर अपने वंश की भीत तू डालेगा ?
पुत्र हीना, पति हीना, लज्जा हीना पर?
है कटे मस्तक से सनी मिट्टी जहां की
उसी कुरुभूमि पर काट गिरा तू मेरा भी सर |
निस्सार, निस्तेज, निस्पृह या निस्संतान
क्या कहेगा तू मुझे ? गंगापुत्र न कहना !
रक्तिम आँखों से रक्तरंजित रक्ताभूमि को देख
अब तो जल से भी होने लगी है घृणा |
अश्रुपान, रक्तपान, गरलपान, हलाहलपान कर
अब गंगा पान की इच्छा निस्तेज हो गयी |
वीरों सा लड़खड़ा गिरता शून्य पर तो भला होता
आज यह शस्त्र-सय्या मेरी सेज हो गयी !
घृणित इस युद्ध की दुन्दुभी की प्रतिध्वनि से
रक्त स्राव करते मेरे कर्ण; कुण्डल भीगे से |

II
इस धर्मंयुद्ध में धर्म कहाँ है ? नीति कहाँ है ? आदर्श कहाँ है ?
ओ हत्यारे ! अब तुझे धर्मराज कौन बुलाएगा ?
पांच के सुख-दुःख को उद्देश्य मान कर
असंख्य निर्दोष के लहू कौन दस्यु बहायेगा ?
नस तोड़ लहू फूटी थी तेरी
जब हुआ था इस मृत्युलीला का शंखनाद |
पांच गरल मिल हलाहल बने थे
आज कहाँ है वह शौर्य ? वह उन्माद ?
कौरव दुष्ट थे, दम्भी थे, अत्याचारी थे
तुम्हे मिली अल्प भिक्षा के व्यापारी थे
त्याग, तप, क्षमा की अपेक्षा मैं किससे करता कहो ?
या क्रूर अट्टाहास कर मानव रक्त से कहता- बहो !
घृणा स्वयं से होती है; रक्त रंजित हाथ मेरे
या किसी सुहागिनी की ललाट के पुंछे सिन्दूर की लाली है ?
असंख्य गंगा स्नान करुँ मैं, चाहे उसमे डूब मरूं मैं
कभी ज्योतिर्मय जो मुख की विभा; आज काली की काली है |
अन्तर्व्योम के प्रचंडावेग से मानव तेरा नाश हुआ
सभ्यता का लोलुप मानव; आज स्वार्थ का दास हुआ |

III
पुण्य और पाप हैं आज घुलमिलकर एक
क्या अद्भुत समन्वय है दोनों तटों में !
कौरव करें तो पाप ? तुम करो तो पुण्य ?
ऐसा होता नहीं जीवंत में, कल्पना में, नटों में |
है मानव कर रहा जिस द्रोहाग्नि में त्राहि
है सूखता मानव लहू जिस शौर्यगाथा की एकमात्र स्याही
मैं उस अश्रुदाह का स्तूप हूँ
शान्ति क्षुधा है जिस याचक की अकेली राही ||”
-कह मूर्त द्वापर पुरुष तत्वचिंतन लीन हुए
लाचारी से मेघों को देख, उसी के जल में तल्लीन हुए
युधिष्ठिर भी था नहा; वर्षा नहीं अपितु अश्रु में
नेत्रों की दीपशिखा बुझती सी; संकोच कर; फिर कह दिए-
“क्षमा करें पितामह; त्याग, तप, स्नेह, क्षमा
युद्ध में हैं सारे दरकिनार से
जब गलता नहीं पाषाण अश्रुधार से
तब तोड़ना पड़ता है प्रार्थना या के प्रहार से ?
आत्मरक्षा में हैं खग भी चोंच मारते
फिर हमीं क्यों हैं दोषी इस समाज के ?

IV
लाक्षागृह के साथ ही तो जल गए
थे बचे जो अश्रुकण वो प्यार के |
मनुष्यता की पराकाष्ठा ही बदल दी
वे चाल चल रहे थे जब सियार के |
त्याग, तप, करुणा, क्षमा; वो थे किधर ?
लज्जा हरण जब हुआ था निज नार का !
आप भी तो मूक थे खड़े उधर
विस्फोट वो जब हुआ था इस ज्वार का !
नहीं चाहिए हमें ये राजस्व
हम में क्षुधा है तो केवल प्यार का
क्यों मांगे चरणों में गिरकर अपने अधिकार को ?
भिक्षा में नहीं मिलता स्वत्व; उस पार का |
ह्रदय रक्त पी चुका था वो मेरा
पूरी मानव जाति पर दाहक दृष्टि डाल सकता था ||
कहने सुनने को हम निमित्त मात्र थे
इस युगांत नागिनी की विष-फूंकार में काल ही तो वक्ता था |
पर अन्याय जब अभिशाप बन अपनों को दंशे
तो इस महाभारत को कौन टाल सकता था ??

-Sourav Roy “Bhagirath”

One Response to आत्मदाह

  1. उत्तम सौरव जी,

    ख्ण्डकाव्य तक विस्तार पा सकने की संभावना है इसमें तो

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