ऐ चाँद !
तुम्हारे शब्द
सात-सागर में ज्वार कर
फेन में गूँज
संग बह जाते हैं दूर देश को
जहां हमेशा दिन होता है
परी-देश का द्वार खटखटाकर
हर मन में मुस्कान बन
होठों पर उभरते हैं और
स्वप्नों में मोना-लीसा रहस्य बन
जाने कितने चित्रों में गूँज उठते हैं तुम्हारे शब्द |
नदी-पर्वत-तराई-वनों में विचरकर
वही शब्द मेघ तले गगन तट पर
सूर्य संग मुस्कुराते हैं
हर चिता संग जलते हैं और
हर नवजात शिशु की मुस्कान
संग अवतरित हो
सूने नयनों को स्वप्न दे जाते हैं
और फिर किसी शीत वायु के संग हंस
तेरी वाणी सितारों में गूँज उठती है
और अगले ही भोर
फूल बन खिल उठते हैं
तुम्हारे शब्द !
- सौरभ राय















भावप्रवण. दिल को छू लेनेवाली.
मैं यहाँ पहले भी आया था. बहुत अच्छा ब्लौग है. कोरा-सफा सा, उजला, स्निग्ध.
और वर्डप्रेस कस्टम डोमेन पर, मेरे ब्लौग जैसा. मुझे बहुत अच्छा लगा.
धन्यवाद, मित्र.