“उत्थिष्ठ भारत“ (meaning arise India, 2011, ISBN- 978-93-5067-052-1) मेरी कविताओं का दूसरा संग्रह है ।
कभी पढ़ा था कि पद्य भाषा का लोकतंत्र है | पद्य चाहे छंदबद्ध हो या मुक्तक, वो भाषा को स्थिरता एवं ऊँचाई प्रदान करता है | आज हम ऐसे युग में जी रहे हैं, जब हमारा लोकतंत्र एवं हमारी भाषा, दोनों खतरे में हैं | साम्राज्यवाद और आधुनिकता के होड़ में हम उस स्वतंत्रता एवं संस्कृति को भूल रहे हैं जिसे हम कभी सर्वोपरि रखते थे |
पिछले साल, सन् 2010 में मैंने चन्द्रप्रकाश द्विवेदी जी की चाणक्य देखी जो एक समय दूरदर्शन में प्रसारित होती थी | वैदिक काल में केन्द्रित इस कथा में दर्शाया गया है कि किस प्रकार खण्डों में बटें जनपदों को पहली बार एक संगठित राष्ट्र की तरह एक शिक्षक ने देखा, और किस प्रकार राष्ट्र भक्ति की भावना ने भारत को सिकंदर के आक्रमण से बचाया | भारतवर्ष के इस पुरातन युग की कथा को देख-परख कर ऐसा लगा मानो कुछ भी तो नहीं बदला है ढाई हज़ार वर्षों में ! आज भी हम एक देश तो हैं, पर जाती धर्म के नाम पर विभाजित हैं | विदेशिओं का आक्रमण, सेना के बजाय आर्थिक नीतियों से आज भी जारी है | लाख कोशिशों के बावजूद भी हम आज तक स्वावलंबी नहीं बन पाए हैं |
ऐसे में मुझे वो वाच्य याद आया जो चाणक्य ने अपने शिष्यों को अपनी कड़कती वाणी में कहा था – “उत्थिष्ठ भारत!” इस वाच्य ने मुझे काफी प्रभावित किया | युवा में प्राण भरने की शक्ति, इस वाच्य में हज़ारों साल पहले थी, और शायद आज भी है |
इस वाच्य की जड़ें हमारी संस्कृति में बहुत गहरी है | कठ उपनिषद् में कहा गया-
“उत्थिष्ठ जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत । क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥”अर्थात- “उठो, जागो, और सज्जनों से ज्ञान प्राप्त करो, क्योंकि तुम्हे चलते रहना है, कठिन दुर्गम रास्ते पर, ऐसा ज्ञानी कहते हैं |”
ढाई हज़ार वर्षों के उपरांत, इसी कथन को स्वामी विवेकानंद ने सरल भाषा में दुहराया | उन्होंने कहा- “Arise, Awake, and Stop Not Till the Goal Is Reached!”
इस संग्रह में आपको कभी देशभक्ति की भावना फूटती नज़र आएगी, तो कभी छोटानागपुर में बसे आदिवासियों के संघर्षमय, स्वप्निल, कर्मप्रधान जीवन के दर्शन होंगे | कुछ कविताओं में समाजवाद दिखेगा तो कुछ कविताएँ विरक्ति एवं विद्रोह के रस में डूबे मिलेंगे | अंत की कुछ कविताएँ मोहभग्न करते नज़र आयेंगे, तो कुछ में राजनीती, संस्कृति, प्रेम, वात्सल्य जैसे रसों का भी समागम मिलेगा |
वटवृक्ष, हिन्द-युग्म, परिकल्पना, परिचय, परिचर्चा, इत्यादि कई पत्र पत्रिकाओं की संपादिका, हिंदी की सुप्रसिद्ध लेखिका, श्रीमती रश्मि प्रभा जी कलम से उत्थिष्ठ भारत की समीक्षा यहाँ पढ़ें ।
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